खड़ा हूँ मैं सदियों से. पहाड़-सा. खिरता हुआ.
देखता हुआ,चारों सिम्त.घूमता हुआ धरती के साथ.
फैली हुई घाटियों की आवाज पर और खिरता हुआ मैं सोच
रहा,कि गिरुं;या धसुं .चलने के मेरे पाँव दब गए
हैं ;अपने वजूद के नीचे.मैं हाथों के बल चलने की कला पर हाथ आजमा
रहा हूँ.अपने भीतर भरता हुआ खोखलापन।