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गुरुवार, 20 अगस्त 2009
फर्क जो उम्मीद और महसूस करने से ज्यादा
कभी -कभी रुई भी चुभती है। हवा पहनी जाती है। और अपनी तरह का ये वो सिलसिला है,जो अपना एक समूह चाहता है। ये परवाह करता है । नए ,थोड़े पुराने जुडाव ,के समांतर अपना वजूद रखता है। आदत के मारे हम जैसे ,उखड़ ही तो जाते हैं, और,और गिर पड़ते हैं अपने ही पांवों पर। हमारा शुद्द वजन हम नहीं होते। विपरीत दिशाओं से पड़ने वाले दबाव भी शामिल हैं।
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